प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।
अन्येषां चैव तीर्थानां सङ्ख्या नास्ति महीतले ।।

नैमिषारण्य के प्रमुख स्थल

1. चक्रतीर्थ
महापुराण, उपपुराण तथा औपपुराणों में वर्णित है कि ब्रह्मा जी के द्वारा छोड़े गये ब्रह्ममनोमय चक्र से चक्रतीर्थ की उत्पत्ति हुई है। इसके स्नान मार्जन के फल का वर्णन करते हुए पुराणो में लिखा है अर्थात् चक्रतीर्थ महान पुण्यदायी है और सभी प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला है। पृथ्वी के मध्यभाग मे स्थित है और पृथ्वी का देवता है ।
अर्थात् कुरुक्षेत्र मे सूर्यग्रहण के पड़ने पर स्नान से जिस पुण्य की प्राप्ति होती हैं। उसी पुण्य की प्राप्ति चक्रतीर्थ मे मार्जन से होती है ।
महाभारत में वर्णित है कि चक्रतीर्थ में स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है ।
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2. ललिता देवी
विभिन्न पुराणों में वर्णित है कि सती ने दक्षयज्ञ मे शरीर त्याग के उपरान्त शिव जी सती जी के पर्थिव शव को स्कन्ध पर डालकर अन्मयस्कभाव से विचरण करने लगे, जिससे सृष्टि संहार कार्य बधित हो गया तब विष्णु ने लोक कल्याण की भावना से प्रेरित हो सती माता के शव के 108 टुकड़े किये जो शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुये । उसमे से नैमिष मे स्थित शक्तिपीठ लिंगधारणी ललिता नाम से प्रसिद्ध है ।
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3. व्यासगद्दी
पुराणों के अनुसार यहाँ पर महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन तथा पुराणों का निर्माण करके उनका ज्ञान अपने प्रमुख शिष्यों जैमिन, अंगिरा, वैश्म्पायन, पैल तथा शुकदेव एवं सूत जी को श्रीमद्भागवत् तथा पुराणों का ज्ञान कराकर उन्हें प्रचार प्रसार का निर्देश दिया ।
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4. स्वायम्भूमनु सतरुपा
पद्मपुराण, रामायण तथा रामचरितमानस के अनुसार आदिपुरुष स्वायम्भूवमनु तथा सतरुपा ने भगवान को पुत्र रुप में प्राप्त करने की इच्छा घोर तप किया एवं वरदान प्राप्त किया ।
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5. सूतगद्दी
महर्षि सूत जी ने यहाँ शौनक आदि 88000 ऋर्षियों को पुराण को सुनाए ।
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6. हनुमान गढ़ी एवं पांड़व किला
भागवन श्री राम-रावण युद्ध के समय अहिरावण ने जब राम तथा लक्ष्मण का अपहरण किया तब हनुमान जी पातालपुरी मे जाकर अहिरावण का वध करके कंधों पर राम और लक्ष्मण को बैठाकर यही से दक्षिण दिशा (यानि लंका) की ओर प्रस्थान किया ।अतः यहाँ दक्षिणमुखी प्रकट हुए ।
यहीं पर पाण्डवों ने महाभारत के उपरान्त आकर 12 वर्ष तपस्या की है जिससे पांड़व किला कहते हैं ।
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7. दशाश्वमेघ घाट
गोमती नदी के किनारे श्री रामचन्द्र जी ने दशम् अश्वमेघ यज्ञ किया था । जिसके कारण इसका नाम दशाश्वमेघ घाट पड़ा यहाँ पर राम़, लक्ष्मण जानकी एवं सिद्धेश्वर महादेव जी का अति प्राचीन मन्दिर हैं ।
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8. दधीचि कुण्ड
वृत्तासुर दैत्य का वध करने के लिये देवराज इन्द्र ने महान तपस्वी महि दधीचि जी से उनकी हड्डियो का दान मांगा । तब दधीचि जी ने कहा मुझे जन कल्याण के लिये देह त्याग करने मे परम प्रसन्नता है परन्तु मै उससे पहले सभी तीर्थों व देवी.देवताओं का दर्शन करना चाहता हूँ । इन्द्र ने कहा इसमें बहुत समय लग जायेगा तब तक वृत्तासुर हम सबको मार देगा । इसलिए सभी तीर्थों को यहीं बुला लिया गया और उन्हें सभी तीर्थों के जल से स्नान कराया सभी तीर्थों के जल आपस मे मिलने के कारण यह तीर्थ मिश्रित तीर्थ कहलाया । यह मिश्रित तीर्थ दधीचि कुण्ड के नाम से विख्यात हुआ जिसमें स्नान मार्जन करने से सभी तीर्थों के स्नान मार्जन का पुण्य प्राप्त होता हैं ।
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इसी स्थान पर दधीचि ने गायों से शरीर चटवाकर अपनी अस्थियों का दान किया जिससे वज्र बना और वृत्तासुर का वध हुआ ।
इनके अतिरिक्त हत्याहरण, देवदेवेवर, रुद्रावर्त,सीताकुण्ड आदि अन्य महत्वपूर्ण तीर्थ है।