प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।
अन्येषां चैव तीर्थानां सङ्ख्या नास्ति महीतले ।।

नैमिषारण्य का इतिहास

कूर्मपुराण, शिवपुराण, पद्मपुराण, देवीभागवत, वायुपुराण, मत्स्यपुराण आदि पुराणों के अनुसार ऋषियों ने ब्रह्मा जी से ऐसा पवित्र स्थान बताने को कहा जहाँ कलयुग का प्रभाव न हो और पूजन, भजन, तपस्या आदि करने से अति शीघ्र मनोवंछित फलों की प्राप्ति हो सके । ब्रह्मा जी ने ऋषियों की मनोकामना को पूर्ण करते हुए अपने मन से एक चक्र की उत्पत्ति की और उसे छोड़ते हुए कहा इस चक्र की नेमि (मध्य भाग) जहाँ गिरेगी वह अत्यन्त पुण्य एवं शीघ्र फलदायी भूमि होगी । नेमि के गिरने के कारण ये क्षेत्र नैमिषारण्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ