प्रथमं नैमिषं पुण्यं चक्रतीर्थं च पुष्करम् ।
अन्येषां चैव तीर्थानां सङ्ख्या नास्ति महीतले ।।

नैमिषारण्य एक पवित्र स्थल

नैमिषारण्य सतयुग का तीर्थ है, जो अति पावन है। इसके दर्शन मात्र से लोगों के पाप नष्ट हो जाते हैं और यह मोक्ष एवं सिद्धियों को प्रदान करने वाला है जिसका प्रमाण विमिन्न वैदिक एवं पौराणिक धर्म ग्रन्थों में मिलता है। नैमिषारण्य को नैमिष व नीमसार एवं नीमषार भी कहते हैं।

अर्थात् इस समस्त पृथ्वी पर अनेक तीर्थ विद्यमान है जिनकी गणना नही की जा सकती जिनमें प्रथम पुण्यप्रद नैमिषारण्य का चक्रतीर्थं व पुष्कर है

यह भूमि पुराण कथाओं की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है जहाँ पर ऋषियों ने आत्मतत्व ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनेक बार ज्ञान सत्र सम्पन्न किये जैसा कि श्री मद्भागवत् में लिखा है

विश्वविख्यात सत्यनारायण की कथा का प्रादुर्भाव अर्थात् उत्पत्ति इसी पावन भूमि से हुई है । इस कथा के प्रथम श्लोक मे इस तीर्थ का वर्णन हुआ है ।

पृथ्वी के पवित्र नौ आरण्यों मे इसकी गणना की गयी है जिसका वर्णन देवी भागवत में है ।

कहा जाता है कि पृथ्वी के समस्त तीर्थं नैमिषारण्य मे हैं जिससे यहाँ आने पर उन सभी तीर्थों का फल प्राप्त होता है जिसका प्रमाण महाभारत मे मिलता है

उत्तर भारत के प्रमुख संत एवं हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि गोस्वामी तुलसीदास ने इस तीर्थ के विषय मे रामचरितमानस मे लिखा है । नैमिषारण्य नाभि (पेट) गया है जहाँ पिण्ड़ दान करने से पितृ ( माता-पिता व पूर्वजों) का पेट भरता है । जिससे पितृ-दोष से मुक्त होकर व्यक्ति सुख सम्पन्नता को प्राप्त करता है।